इस्लाम के भीतर ही एक सुधारवादी आन्दोलन के रूप में ईरान से शुरू हुआ उसे ही सूफीवाद या सूफी आंदोलन कहा। जिसके माध्यम से शिया व सुन्नी सम्प्रदायों के मतैक्य को दूर करने की कोशिश की।
मुतजिल व तुर्क बुद्धिवादी दर्शन का आधिपत्य समाप्त कर, पुरातन -पंथी विचारधारा का जन्म किया जो कुरान व हदीस पर आधारित थी।
सूफीवाद का प्रारम्भ ईरान के बसरा शहर के अन्तर्गत हुआ। सूफियों का जीवन साधारण होता था तथा वे मूर्तिपूजा नहीं करते थे।
सूफियों द्वारा एक ईश्वर में ही आस्था रखी जाती व सभी कुछ उसी ईश्वर में हैं।
सूफीवाद में गुरू (पीर), शिष्य (मुरीद), उतराधिकारी (बलि) के बीच- में इनका आपस में महत्वपूर्ण स्थान है।
भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पूर्व ही सूफी सिलसिले का आगमन हो गया था।
भारत में सूफी आंदोलन
बारहवी शताब्दी में अनेक सूफी सन्त भारत आये जिनमें सबसे पहले आने वाले चिश्ती सन्त थे। जिसके अन्तर्गत मुइनुद्दीन चिश्ती पृथ्वीराज चौहान के शासन काल के अन्तर्गत आये।
भारत में प्रथम व अन्तिम एकमात्र महिला रहस्यवादी राबिया हुई।
आइने अकबरी में अबुल फजल ने 14 सूफी सिलसिलों के बारे में उल्लेख किया जिनमें प्रमुख है चिश्ती, सुहारवर्दी, नक्शबंदी व कादिरी सिलसिलें।
सूफी सिलसिला को दो वर्गों में बाँटा
बा शरा – जो इस्लामी विधान को मानते है
बे शरा – जो शरा को नहीं मानते
सूफियों के आवास स्थल को खानकाह कहते हैं।
भारत में इस्लामी रहस्यवाद की प्रथम, पाठ्य पुस्तक कश्फ- उल -महजूब की रचना ‘अल हुजवेरी’ ने लाहौर में की।
जो महमूद गजनवी के आक्रमण के पश्चात् लाहौर में रहने लगे।
सूफी सन्त समा (संगीत व नृत्य) को ईश्वर प्राप्त करने में (फना होने में ) सहायक मानते हैं।
17 वीं शताब्दी में फारसी में लिखी पुस्तक दबिस्तान- ए मजहिब मे सभी धर्मों को लेकर तुलानात्मक रूप सें अध्ययन किया है। राज्य के नियंत्रण से मुक्त आध्यात्मिक क्षेत्र को सूफी शब्दावली में विलायत की श्रेणी में रखा।
प्रमुख सूफी सिलसिले व संस्थापक
चिश्ती सम्प्रदाय (12 वीं सदी)
चिश्ती समुदाय की उत्त्पति हेरात में हुई। व इसके मूल संस्थापक ख्वाजा अब्दुल चिश्ती थे।
चिश्ती सम्प्रदाय को भारत के प्राचीन सिलसिला के अन्तर्गत मानते है।
भारत में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती को चिश्ती सम्प्रदाय के संस्थापक मानते है जो मुहम्मद गौरी की सेना के साथ भारत आये। व इन्होने अजमेर में चिश्ती संप्रदाय की नींव डाली।
वे अद्वेत दर्शन में विश्वास रखते थे तथा ईश्वर प्रेम व मानव की सेवा इनका प्रमुख सिद्धांत था।
मुहम्मद गोरी ने मोईनुद्दीन चिश्ती को सुल्तान-उल-हिन्द की उपाधि से विभुषित किया।
चिश्ती सम्प्रदाय के सबसे लोकप्रिय सन्त निजामुद्दीन औलिया व उनके शिष्य नासिरूदीन चिराग-ए-दिल्ली थे।
निजामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य अमीर खुसरो थे। खुसरो ने औलिया की मरने के बारे में सुनने पर दुसरे ही दिन अपने प्राण त्याग दिये। इनको अपने गुरु के पास ही दफनाया।
निजामुद्दीन औलिया अविवाहित थे।
गयासुद्दीन तुगलक ने निज़ामुद्दीन औलिया की लोकप्रियता से भयभीत होकर दिल्ली छोड़ने का आदेश भी दिया।
ऐसा माना जाता है कि निजामुद्दीन औलिया के समय मे सात सुल्तान दिल्ली की गद्दी पर बैठे। पर निजामुद्दीन औलिया किसी के दरबार में नही गये।
निजामुद्दीन औलिया को उनके उदार दृष्टिकोण के कारण उन्हे महबूब-ए-इलाही के नाम से भी जाना जाता।
निजामुद्दीन औलिया को योग की प्राणायाम पद्धति में निपुणता प्राप्त थी। उन्हें योगी सिद्ध के नाम से भी जानते थे। औलिया का मानना था कि कुछ हिन्दु जानते है कि इस्लाम एक सच्चा धर्म है परन्तु ये इसे कबूल नहीं करते।
चिराग-ए-दिल्ली के उत्तराधिकारी सैयद मुहमद गेसूदराज बहमनी सल्तनत की स्थापना हो जाने के बाद कर्नाटक में गुलबर्गा में स्थायी रूप से बस गये।
चिश्ती सम्प्रदाय से प्रभावी होकर, बंगाल के शासक हुसैनशाह ने अपना सत्यपीर आन्दोलन चलाया दुःखी व गरीबो के प्रति गेसूदराज के प्रेम व मानव अधिकारों की रक्षा के कारण बन्दानवाज की उपाधि दी।
कादिरी संप्रदाय :- 15वीं शताब्दी
कादिरी सम्प्रदाय की स्थापना शेख अब्दुल कादिर जिलानी ने की थी।
भारत में इस सम्प्रदाय की शुरुआत 15वी सदी में सैय्यद नासिरुद्दीन मुहम्मद जिलानी ने सिन्ध में की व शाह नियामतउल्ला ने अपना योगदान दिया।
भारत में इस सिलसिले के प्रसिद्ध सन्त शेख मीर मुहम्मद मियाँ मीर थे।
शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह कादिरी सिलसिले के अनुयायी थे। उन्होंने लाहौर में मियाँ मीर से भेंट की। मियाँ मीर की मृत्यु होने पर द्वारा मुल्तान शाह बदख्शी नामक उनके उत्तराधिकार का शिष्य बन गया।
कादिरी सम्प्रदाय के अन्य लोकप्रिय सन्तो में शेख मुसा, शेख दाउद किरमानी व शेख अब्दुल माली कादिरी थे।
कादिरी सम्प्रदाय का प्रचार प्रसार उत्तरप्रदेश व दक्षिण में अधिक हुआ।
शत्तारी सम्प्रदाय 15वी शताब्दी
लोदी काल में जोनपुर के शाह अब्दुल्ला शतारी ने शतारी सम्प्रदाय की स्थापना की इस सम्प्रदाय के सबसे प्रसिद्ध सन्त ग्वालियर के मुहम्मद गोस थे। मुहम्मद गौस हाजी हमीद हसन के शिष्य थे ।
मुहम्मद गौस की प्रसिद्ध पुस्तकें
1.जवाहर-ए-खामशाह
2.खालिद – ए.-मुखाजिन
शत्तारी सम्प्रदाय के सूफियों ने भी सुहरावर्दियों की भांति लौकिक सुविधाओं से पूर्ण आरामपूर्वक जीवन व्यतीत किया।
शतारी सम्प्रदाय बंगाल, जौनपुर, दक्खन में केन्द्रित हुआ व गुजरात व मध्यप्रदेश में प्रसिद्ध हुआ।
नक्शबंदी सम्प्रदाय 16 वी सदी
नक्शबंदी सम्प्रदाय की स्थापना ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंदी ने बगदाद में की।
भारत में इस सम्प्रदाय की स्थापना ख्वाजा बाकी बिल्लाह ने उच्छ में की।
इस सम्प्रदाय के प्रसिद्ध सन्त शेख अहमद सरहिन्दी ने स्वयं 1 को मुज हिद अलिफसानी कहा तथा उन्होंने अकबर की उदार नीतियों का विरोध किया।
शेख अहमद सरहिन्दी मनुष्य व ईश्वर का सम्बन्ध दास व मालिक का मानते हैं।
जहाँगीर ने शेख अहमद सरहिन्दी को 1619 ई. में बन्दी बना लिया
नक्शबंदी सम्प्रदाय सूफियों में सबसे अधिक कट्टरवादी सिलसिला है।
सुहरावर्दी सम्प्रदाय :- 12वी सदी
सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना बगदाद के शिक्षक शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी ने की।
भारत में इस संप्रदाय को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उनके शिष्य बहाउद्दीन जकारिया व जलालुद्दीन तबरीजी को दिया जाता है।
सैय्यद जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी के बारे में कहते है कि इन्होंने 36 बार मक्का की यात्रा की इस्लामी देशो में भ्रमण करने के कारण इन्हें जहाँनियाँ जहाँगस्त भी कहते हैं।
सुहरावर्दी सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र मुल्तान था। यह पंजाब व सिन्ध में भी प्रसिद्ध हुआ सुहरावर्दी सम्प्रदाय के सन्त आरामदायक व विलासिता का जीवन व्यतीत करते व सक्रिय रूप से राजनीति में भाग लेते।
फिरदौसी सम्प्रदाय :-13 वी सदी
फिरदौसी सम्प्रदाय की भारत में स्थापना शेख बदरुद्दीन समरकन्दी ने की। यह सम्प्रदाय बिहार में अधिक प्रसिद्ध था
बिहार में शेख सरफुद्दीन याहिया मुनीरी इसके प्रसिद्ध सन्त थे जो फिरोज तुगलक के समकालीन माने जाते हैं।
फिरदौसी सम्प्रदाय सुहरावर्दी समुदाय से अधिक प्रभावित था।
शेख याहिया मुनीरी ने मक्तूबात की रचना की जिसमें वहदत -उल-वजूद के सिद्धान्त के माध्यम से इस्लाम के नजदीक लाया गया।