राजस्थान में स्थापत्य कला
राजस्थान के नगर महल व हवेली स्थापत्य
राजस्थान में स्थापत्य कला का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना मानव का इतिहास है। मुसलमानों के भारत आने से पहले यहां स्थापत्य कला की शैली विकसित हो चुकी थी। हिन्दु स्थापत्य शैली अपनी सम्पन्नता, अलंकरण व विविधता के लिए प्रसिद्ध है।राजस्थान में नगर स्थापत्य महल स्थापत्य व हवेली स्थापत्य में स्थापत्य कला देखने को मिलती है।
राजस्थान में नगर स्थापत्य
सातवीं से तेरहवीं सदी तक का काल राजस्थान में स्थापत्य की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा। राजपूत काल में जहाँ जहाँ राजधानियां बनी वहाँ नगर विन्यास की भूमिका महत्वपूर्ण रही नगर विन्यास रक्षा की दृष्टि से पहाड़ों से घिरे विस्तृत स्थान पर होता आया है या फिर नदी किनारे ऐसे स्थान पर जहाँ पानी की पारिखा स्वतः ही रक्षात्मक रही है।
राजस्थान में बैराठ, मेनाल, नागदा राजोरगढ़, नगरी आदि प्राचीन नगर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माने गए है।
राजस्थान के नगर –
बीकानेर नगर –
मान्यता है कि नायरा या नेरा इस स्थल के मालिक का नाम था। जिसने इस स्थान के स्वामित्व को इस शर्त पर छोड़ा कि उसका नाम राव बीका के साथ जुड़ा रहेगा। इस कारण इस स्थान का नाम बीकानेर पड़ा। बीकाजी ने जो भूमि अर्जित की 3 अप्रैल 1488 को अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। जहाँ नगर आबाद है वह स्थान राती घाटी के नाम से जाना जाता था। 1442 में बीकाजी ने राती घाटी के उस टीले पर अपना छोटा सा किला बनवाया जहाँ वर्तमान समय में लक्ष्मीनाथ जी के मन्दिर के सामने गणेशजी का मन्दिर है।
बीकानेर के भीतर इलाकों में बनी कुछ पुरानी हवेलियों के लाल पत्थर पर नक्काशी युक्त जाली झरोखे व द्वार देखने योग्य है।
जयपुर नगर –
जयपुर शहर को भारत का पेरिस, छोटी काशी, दूसरा वृन्दावन व गुलाबी नगर के नाम से भी जानते है। जयपुर को राजस्थान की राजधानी होने का भी गौरव प्राप्त हुआ।
जयपुर शहर ऐतिहासिकता व सांस्कृतिक धरोहर को अपने में संजोये हुये है। अपनी कई विशेष बातों के कारण जयपुर शहर देश व विदेश के व्यक्तियों लिए आकर्षण का केंद्र बना।
कच्छावाहा वंश के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा 18 नवम्बर 1727 को जयपुर की स्थापना की। व नींव सवाई जयसिंह के राजपुरोहित व राजगुरू पण्डित सम्राट जगन्नाथ द्वारा रखी गई। जयपुर शहर को शिल्पशास्त्री विद्याधर ने नौ वर्गों के सिद्धांत पर बसाया। शहर के चारों और सात दरवाजे बनाये गये जिनमें ध्रुव पोल, घाट गेट, न्यू गेट, सांगानेरी गेट, अजमेरी गेट चाँदपोल गेट व सूरजपोल गेट के नाम से जाने जाते है। जयपुर के नगर नियोजन में इस समय के चीनी नगरों में केटोया के नगरों व बगदाद की तरह वृत्ताकार परिमितियाँ एवं वर्गाकार उन दो महान सिद्धांतों का पालन किया है गया।
राजस्थान में महल स्थापत्य
सिटी पैलेस (अलवर)
अलवर वंश के तीसरे शासक महाराणा विनयसिंह ने ईस्वी सन् 1776 में विनय विलास महल का निर्माण करवाया। सिटी पैलेस पहाड़ी की तलहठी से सागर नामक सुन्दर तालाब द्वारा अलग किया हुआ है। इस महल के निर्माण में मुग़ल व राजपूत शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है।
सिलीसेढ़ (अलवर)
महाराजा विनयसिंह ने सन् 1844 में अपनी रानी शिला के लिये एक छः मंजिला महल का निर्माण करवाया, जो अलवर शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर सुरम्य स्थल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना है।
डीग महल (भरतपुर)
यहाँ के जलमहल काफी प्रसिद्ध है। 2 तालाबों के बीच बने जलमहल को सूरजमल द्वारा बनवाया गया, इनमें बने गोपाल भवन, हरिदेव भवन, नंदभवन, केशव भवन व श्रावण- भादो आदि महाराजा सूरजमल के ग्रीष्मकालीन आवास स्थान है। जहाँ सूरजमल युद्ध में से आने के बाद अपनी थकान दूर करते थे। ये महल अपनी विशालता, उत्कृष्टता व शिल्प सौन्दर्यता के लिए प्रसिद्ध है।
विजय मंदिर (अलवर)
अलवर से 10 किलोमीटर दूर 1918 में महाराजा जयसिंह द्वारा इस महल का निर्माण करवाया गया। इस महल की सुन्दरता यहाँकी खूबसूरत झील के कारण और भी बढ़ जाती है। इस महल में स्थित सीताराम मंदिर धर्म प्रेमी दर्शकों को अपनी और आकर्षित करता है।
सरिस्का पैलेस (अलवर)
इसका निर्माण महाराजा जयसिंह ने ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग की शिकार यात्रा के उपलक्ष्य में करवाया। यह अलवर – जयपुर सड़क मार्ग पर अलवर से करीब 35 किलोमीटर दूर सरिस्का अभ्यारण्य प्रकृति व वन्य जीव प्रेमी सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है। वर्तमान समय में यह होटल सरिस्का पैलेस में परिवर्तित की गई।
रंगमहल (बूंदी)
रंगमहल का निर्माण बूँदी के महाराव छत्रशाल द्वारा करवाया गया। यह महल अपने भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। जिनमें धार्मिक, ऐतिहासिक व शिकार संबंधी दृश्य चित्रित किए गए हैं। राजमहलों में छतर महल, दीवाने आम, रंगविलास, अनिरुद्ध महल बादल महल व चित्रशाला दर्शनीय है।
उदयविलास पैलेस ( डूंगरपुर)
सफेद संगमरमर व नीले पत्थर से इस महल का निर्माण किया गया। पौराणिक दृश्यों को भी इसकी दीवारों पर करीने से उतरा है। यह गैप सागर के तट पर हरे-भरे 8 बाग़ – बगीचों से पाषाण कारीगरी का नमूना है
लालगढ़ पैलेस (बीकानेर)
बीकानेर शहर में स्थित लालगढ़ पैलेस यहाँ के विशाल भवनों में से एक है। लालगढ़, पैलेस का निर्माण गंगासिंह जी द्वारा उनके पिता लालसिंह की याद में बनवाया। इस महल में करीब 100 कमरे हैं व एक पुस्तकालय है।
चित्रशाला (बूंदी)
बूंदी राजमहल में बनी चित्रशाला को भीति चित्रों का स्वर्ग कहा जा सकता है। यहाँ पर ऋतुओं के आधार पर राग – रागिनियां, नायिका भेद, कृष्ण लीला के साथ- साथ उत्सवों, शिकार, पर्वों का चित्रांकन करने वाला है।
जुना महल (डूंगरपुर)
यह धनमाता पहाड़ी की ढलान पर बना महल करीब 750 वर्ष पुराना है। यह सात मंजिला महल है जिसकी नींव रावल वीरसिंह देव विक्रम संवत 1339 कार्तिक शुक्ल एकादशी को रखी। यह सात मंजिला महल एक जैसा लगता है जिसमें मुख्य दीवारें, कंगूरे, संकरे द्वार जिससे दुश्मन शीघ्रता से न घुस सकें।
चन्द्र महल (जयपुर)
इस महल का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह के आदेश पर जयपुर के नगर नियोजक विद्याधर चक्रवती ने करवाया। विद्याधर चक्रवती को चन्द्रमहल बनाने के उपलक्ष्य में सिरोपाव कीमती साबिक से नवाजा। चन्द्रमहल सात मंजिला है। जिसमें सबसे नीचे की मंजिल चंद्र मंदिर, दूसरी मंजिल सुख निवास है जो एक खुली छत पर खुलता है। तीसरी मंजिल रंग मंदिर जिसमें भितियों पर शीशे का अति सुन्दर काम किया हुआ है। चौथी मंजिल शोभा निवास में रंग व सुनहरी कलम के साथ विभिन्न आकार के शीशे की जड़ाई है। पांचवी मंजिल पर छवि निवास इसके उपर छठी मंजिल पर श्री निवास व सबसे उपर सातवीं मंजिल पर मुकुट मंदिर है। जहाँ से सारे जयपुर का अद्भुत दर्शन होता है
मुबारक महल वैलकम पैलेस (जयपुर)
यह नयी इमारतों मे से एक महल है जिसका निर्माण माधोसिंह ने अतिथियों के ठहरने के लिए सिटी पैलेस के अहाते में करवाया। यह हिदू, मुस्लिम व ईसाई शैलियों का बेहतरीन नमूना है। महल के दक्षिण की ओर पुरबियाँ की ड्योढी स्थित है यहाँ जो मकान बने है उन्हें चौकी खाना कहा जाता है। व पूर्व की और ऐसा ही विशाल दरवाजा है जिसे गैंडा की ड्योढ़ी कहा जाता है।
सर्वतोभद्र
दीवाने खास के नाम से जाने वाली इमारत को महाराजा सवाई जयसिंह ने सर्वतोभद्र का नाम दिया। जयपुर की यह इमारत चन्द्रमहल के दक्षिण-पूर्व में सब ओर से खुला सभामण्डप स्वरूप है। यह सभामण्डप वर्गाकार स्वरूप में निर्मित है वर्तमान समय में चारो कोनों को बन्द कर वहाँ कोठरियां बनाई गई। सर्वतोभद्र में सभामण्डप में महाराजा माधोसिंह द्वारा 1902 में इंग्लैण्ड यात्रा के दौरान गंगा जल हेतु काम मे लिये चांदी के जल पात्र को प्रदर्शित किया जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। विश्व में चांदी के इतने बड़े बर्तन हमें कहीं नहीं मिलते।
हवामहल (जयपुर)
नगर के मध्य सिटी पैलेस परिसर में स्थित हवामहल जयपुर के सम्मोहन में चार चाँद लगाने वाले असाधारण भवनों में से एक है। हवामहल का निर्माण महाराजा सवाई प्रतापसिंह ने सन् 1799 ई. में करवाया व इसका वास्तुकार श्री लालचन्द था। पिरामिड आकार के इस महल में शिल्प अलंकरण की अनूठी झलक देखने को मिलती है। इसमें पाँच मंजिले है जिसमें प्रथम तल पर प्रांगण मे सुंदर फव्वारों से युक्त स्नान कुंड, शरद मंदिर व प्रताप मंदिर है। दूसरी मंजिल पर रतन मंदिर व अर्ध गोलाकार बालकनी व तीसरी मंजिल विचित्र मंदिर, चौथी मंजिल प्रकाश मंदिर व पांचवी मंजिल हवा मंदिर के नाम से जानी जाती है। इस भवन को 1968 ई. में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया ।
रामबाग पैलेस (जयपुर)
सवाई रामसिंह द्वितीय ने राज्य के अति विशिष्ट व सम्मानीय अतिथियों को रोकने के लिए रामबाग पैलेस बनवाया जिसमें महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने आधुनिक सुख सुविधाओं के सहित विस्तार कर अपने निजी उपयोग के लिए रखा। जिसे केशर बडारण का बाग भी कहा जाता है। वर्तमान में यह महल अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त रामबाग पैलेस होटल में परिवर्तित कर दिया गया। जो जयपुर आने वाले पर्यटकों का राजसी स्वागत करता है।
जलमहल जयपुर
जयपुर से आमेर जाने वाले सड़क मार्ग पर मान सागर जलाशय के मध्य खिलते कमल से देखकर नजर नहीं हटती है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित व सवाई प्रतापसिंह द्वारा प्रवर्धित कर अलग ही आकर्षण पैदा करता है।
मोती डूंगरी महल (जयपुर)
इसका निर्माण सवाई माधोसिंह द्वारा करवाया गया व सवाई मानसिंह की तीसरी पत्नी गायत्री देवी द्वारा इसका निर्माण कार्य पूर्ण करवाकर अपना निजी निवास बनवाया, मोती की तरह दिखने के कारण इसका नाम मोती डूंगरी पड़ा। इसके भूतल पर गणेश जी का सुप्रसिद्ध मंदिर है जहाँ पर गणेश चतुर्थी को विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
सिसोदिया रानी का महल (जयपुर)
ये महल व उद्यान सन् 1728 ई. में सवाई जयसिंह की सिसोदिया रानी चन्द्र कुंवरी के लिए बनवाया गया। इस महल में ही सिसोदिया रानी ने माधोसिंह प्रथम को जन्म दिया। यह महल जयपुर नगर से आठ किलोमीटर पूर्व में पहाड़ियों के मध्य स्थित है।
आमेर का महल (जयपुर)
आमेर के भव्य महलों मे हिन्दू एवं पारसी निर्माण शैली का मिश्रण है। इन महलों का निर्माण राजा मानसिंह ने 17 वीं शताब्दी में करवाया व सवाई जयसिंह के शासन काल तक इनका निर्माण चलता रहा। महल के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही राजपूत व सुगल शैली पर बना दीवान-ए-आम है। जो चारों ओर से लाल पत्थर के खंभों की दोहरी पंक्तियों युक्त बरामदों से घिरा है।
सामोद महल (जयपुर)
यह महल जयपुर से 40 किमी दूर स्थित है। जिसे राजा बिहारीदास ने 1645 से 1652 के मध्य बनवाया। रावल शिवसिंह ने 19 वीं सदी के मध्य में शीश महल का निर्माण सामोद महल में करवाया। यहाँ पर छतों व स्तम्भों पर काँच का काम आमेर के महलों की तरह है।
बादल विलास व जवाहर विलास (जैसलमेर)
19 वीं शताब्दी में जैसलमेर के महारावलों के निवास हेतु जवाहर विलास व बादल विलास अनोखी कलाकृतियों के अन्तर्गत आते हैं। इनको मुस्लिम सलावटों ने तराशा था, जिसका निर्माण 1884 में किया। बादल विलास के अन्तर्गत बना पाँच ममंजिला ताजिया टॉवर है जो शिल्पकला का बेजोड़ नमूना है। 20 वीं शताब्दी में महारावल जवाहरसिंह ने जवाहर विलास में झरोखों व छतरियों के साथ ही दीवारों पर की गई खुदाई देखने को बनती है।
गढ़ भवन पैलेस (झालावाड़)
गढ भवन पैलेस का निर्माण सन् 1838 में झाला राजा मदनसिंह द्वारा कराया गया। गढ़ भवन का शीशमहल आकर्षक है। गढ़ भवन पैलेस के एक हिसे मे बने राजाओं के चित्र अभी भी अपने चटख रंगों के कारण खूबसूरत लगते हैं गढ़ भवन पैलेस में अन्दर के कक्षों में भव्य रंगशालाएँ, कलात्मक झरोखे, जनानी ड्योढी, दरीरखाना, सभागार व शीशमहल स्थित है।
उम्मेद भवन पैलेस (जोधपुर)
उम्मेद भवन की नींव महाराजा उम्मेद सिंह ने 18 नवम्बर 1928 ई. मे रखी व 1940 में यह बनकर पूर्ण हुआ। इसका निर्माण अकाल राहत कार्यों के अन्तर्गत हुआ था। यह महल एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। छीतर पत्थर से बना होने के कारण इसका नाम छीतर पैलेस रखा गया। वर्तमान समय में उम्मेद भवन में संग्रहालय, थियेटर, केन्द्रीय हॉल व उद्यान देखने योग्य है।
राजमहल (उदयपुर)
उदयपुर के राजमहल इतने सुंदर व भव्य है कि इतिहासकार फर्ग्यूसन ने इन्हें ‘राजस्थान के विंडसर महलों’ की संज्ञा दी। उदयपुर का राजमहल पिछोला झील के तट पर स्थित होने के कारण पिछोला झील का अत्यन्त सुंदर दृश्य दृष्टिगोचर होता है। राजमहल का दो हिस्सो में वर्गीकरण किया गया है। 1. मर्दाना महल 2. जनाना महल
1. मर्दाना महल में शीश महल, कृष्ण महल, मदन विलास, कांच की बुर्ज, किशन विलास, भीम विलास ।
2. जनाना महल में रंग महल, बादल महल
सुनहरी कोठी टोंक
सुनहरी कोठी का निर्माण नवाब मोहम्मद इब्राहिम अली खान ने करवाया। जो संगीत, नृत्य व कविताओं के बहुत शौकीन थे। टोंक बड़ा कुआं के पास नजर बाग में रत्न कांच व सोने की झाल देकर बनाई गई। सुनहरी कोठी की दीवार व छत कांच, रत्न जडित सोने की बेल बूटियां, पच्चीकारी एवं मीनाकारी का कलात्मक स्वरूप देखने योग्य है।
जगनिवास पैलेस (उदयपुर)
पिछोला झील के तट से लगभग 800 फीट की दूरी पर झील के मध्य महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने सन् 1746 में जगनिवास महल का निर्माण करवाया। टापू पर बने इस महल के चारों और पानी है। प्राचीन महलों के अन्तर्गत संगमरमर से बना धोला महल देखने योग्य है।
सज्जनगढ़ पैलेस (उदयपुर)
इस महल का निर्माण करवाना प्रारम्भ सज्जनसिंह ने किया जिसको बाद में फतहसिंह ने पूरा करवाया। फतहसागर झील के पीछे ऊँची पहाड़ी की चोटी पर यह महल बना हुआ है जिसे मानसून पैलेस भी कहते है।
जगमंदिर महल (उदयपुर)
पिछोला झील के बीच जगनिवास के समानांतर ही दूसरे टापू पर जग मंदिर महल बना है। इस महल का निर्माण सन् 1615 में महाराणा अमरसिंह प्रथम ने शुरू किया व महाराणा कर्णसिंह ने सन् 1622 में पूरा किया। शाहजहाँ ने सन् 1622-24 में इसी महल में शरण ली जब अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया था। यहीं से शाहजहाँ को ताजमहल बनाने की प्रेरणा मिली थी।
राईका बाग महल (जोधपुर)
इसका निर्माण कार्य राजा जसवंतसिंह प्रथम की रानी हाडीजी ने सन् 1663 में किया। व जसवंतसिंह द्वितीय को यह महल बहुत पसंद आया था वह अधिकतर समय यहीं व्यतीत करते थे।
खेतड़ी महल (झुंझुनूं)
इस महल का निर्माण भोपालसिंह द्वारा (1735 – 1771) ई में अपने ग्रीष्मकालीन विश्राम के लिये करवाया। जिसको अनेकों खिड़कियाँ व झरोखे से सुसज्जित किया है। इस महल में लखनऊ जैसी भूल-भूलैया व जयपुर के हवामहल की झलक भी देखने को मिलती है।
अबली मीणी का महल (कोटा)
कोटा के महाराव मुकुंद सिंह हाड़ा ने अपनी पासवान अबली मीणी के लिए इस महल का निर्माण करवाया।
रूठी रानी का महल (अजमेर)
अजमेर में बीसलसर झील के पास शिव मंदिर के नीचे की ओर रूठी रानी का महल बना हुआ है। जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ रूठकर यहाँ चलकर आई माना जाता है कि नूरजहाँ को मनाने के लिए जहांगीर यहाँ 27 बार आया था। तब जाकर जहाँगीर से वह राजी हुई थी।
काष्ठ प्रासाद (झालावाड़)
यह महल राजा राजेन्द्र सिंह ने 1936 ई. मे बनवाया। जो लकड़ी से निर्मित है। यह महल तीन हजार पाँच सौ वर्ग फुट में फैला हुआ है।
राजस्थान में हवेली स्थापत्य कला
राजस्थान में हवेली स्थापत्य कला का विकास विशेषकर 17 वीं व 18वीं शताब्दी में हुआ था। हवेली निर्माण के कार्य में सेठ-साहूकारों का विशेष योगदान रहा है। हवेलियों पर बाद में ईरानी स्थापत्य का प्रभाव दिखाई दिया।
हवेली के मुख्य द्वार के अगल-बगल में कमरे, सामने चौबारा, चौबारे के अगल-बगल व पृष्ठ में कमरे होते है यदि हवेली बड़ी होती तो उसमें दो-तीन चौक व कई मंजिले भी हो सकती है।
राजस्थान की हवेलियाँ
बीकानेर की हवेलियां
बीकानेर की सबसे प्राचीन हवेली बच्छावतों की हवेली है। जिसका निर्माण 1593 ई. में कर्णसिंह बच्छावत ने शुरू करवाया। बीकानेर की हवेलियों में लाल पत्थर का उपयोग किया हाया है। हवेलियों के आगे के भागों में मेडी व झरोखों पर नक्काशीदार कार्य किया गया है। इनकी साज सज्जा में मुगल, किशनगढ़ व यूरोपीय चित्रशैली का प्रयोग किया गया है। हवेलियों के बाहर के भागों में छैनी व हथोड़े का कमाल है तो अन्दर के भागो में कमल एवं कुंची ने अपना प्रभाव दिखाया है। 2012 में राजस्थान की विशाल विरासत ने इन हवेलियों को वर्ल्ड मोन्यूमेंट वाच कार्यक्रम में भी शामिल किया।
बीकानेर की महत्वपूर्ण हवेलियां –
- मुंदडा की हवेली गुलेच्छा की हवेली
- मोहता की हवेली
- कोठारी की हवेली
- सेठिया बांठिया की हवेली
- ओसवाल की हवेली
- रामपुरिया की हवेली
शेखावाटी की हवेलियां
शेखावाटी की हवेलियों का निर्माण भारतीय वास्तुकला की हवेली शैली स्थापत्य कला की विशेषताओं के अनुरूप हुआ है। दीवारों पर किये गए चित्रण कार्य में पौराणिक, ऐतिहासिक, विविध विषयों का चयन, स्वर्ण प प्राकृतिक रंगो का प्रयोग व फ्रेस्को बुनो, सेको सिंपल विधियों का प्रयोग किया गया।
भित्ति चित्रण कार्य के लिए प्रसिद्ध हवेलियां रामगढ़ की हवेली, नवलगढ. की हवेली, मण्डावा की हवेली , पिलानी की हवेली आदि
सीकर की हवेलियाँ
- बाला बक्श बियानी की हवेली
- गोपाल जी सोमाणी की हवेली
नवलगढ़ की हवेलियाँ (झुंझुनू)
नवलगढ़ में 100 से ज्यादा हवेलियाँ है। जिनमें रूप निवास की हवेली , भगत जालान पोद्दार व भगेरिया की हवेलियां प्रसिद्ध है। नवलगढ़ की विशाल हवेलियों में भगतों की हवेली का भी नाम भी आता है।
बिसाऊ (झुंझुनू) की हवेलियाँ
बिसाऊ में नाथूराम पोद्दार की हवेली, बनारसी लाल की हवेली, सेठ जयदयाल केडिया की हवेली, सेठ हीरा लाल हवेली एवं सीता राम सिंगतिया की हवेली का शिल्प आकर्षक व मनमोहक है।
झुंझुनूं जिले की ये ऊँची हवेलियों बलुआ पत्थर, इंटें, जिप्सम चुना काष्ठ व ढलवाँ धातु के समन्वय से निर्मित कर दीवारों पर की गई चित्रकारी देखने योग्य है।
झुंझुनू में स्थित ईसरदास मोदी की हवेली सभी हवेलियों में प्रसिद्ध है।
पिलानी की हवेलियाँ
- डाढाओं की पुरानी हवेली
- सरावगियों की मंडेलिया जी की हवेली
- लोयलका की हवेली।
मंडावा की हवेलियां
- हनुमान प्रसाद गोयनका की हवेली
- रामदेव चौखाणी की हवेली
- रामनाथ गोयनका की हवेली
- सागरमल लाडिया की हवेली
चिड़ावा की हवेलियाँ
- पोद्दारों की हवेली
- डालमिया जी की हवेली
- सेकसरिया जी की हवेली
- दुलीचंद जी की हवेली
लक्ष्मणगढ़ की हवेलियां
- सनवतराम चौखाणी की हवेली
- गनेडिया की हवेली
- शिवनारायण मिर्जामल जी की हवेली
- बालमुकुंद बंशीधर राठी की हवेली
- जवाहरमल जी की हवेली
- रमाविलास सांगरिया की हवेली
- केसरदेव सर्राफ की हवेली
- शिकारिया भवन
- जिजोडियों की हवेली
चुरू की हवेलियां
- सुराणों की हवामहल ( छः मंजिल का हवामहल जिसमें 1100 दरवाजे व खिड़कियाँ है
- रामविलास गोयनका की हवेली
- मालजी का कमरा
- मंत्रियो की मोटी हवामहल
- कोठारी हवेली
- दानचंद चौपड़ा की हवेली
फतेहपुर की हवेलियाँ
- महावीर प्रसाद गोयनका की हवेली
- किशोरीलाल जालान की हवेली
जोधपुर की हवेलियां
जोधपुर की हवेलियों में पाल हवेली, पोकरण की हवेली, बड़े मियां की हवेली, पच्चीसा हवेली, राखी हवेली व पुष्प हवेली। पुष्प हवेली विश्व का ज्ञात एकमात्र ऐसा भवन है जो एक ही नक्षत्र पुष्य नक्षत्र में बना है। जिसका निर्माण महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय के कामदार रघुनाथमल जोशी ने करवाया था।
जयपुर की हवेलियां
- पुरोहितजी की हवेली नाटाणियों की हवेली
- ख्वास जी की हवेल
- धाबाई जी की हवेली
- रत्नाकार पुण्डरीक जी की हवेली
- नानाजी की हवेली
झालावाड़ की हवेलियां
- सालिमसिंह की हवेली
- काले बाबू की हवेली
- सात खां की हवेली
- गुलजार हवेली
- दीवान साहब की हवेली
- पुरोहितजी की हवेली
कोटा की हवेलियां
- झालाजी की हवेली
- देवता श्री धर जी की हवेली
टोंक की हवेलियाँ
सुनहरी कोठी – इस कोठी का निर्माण 1824 में नवाब अमीर खाँ पिंडारी द्वारा प्रारंभ किया गया व 1834 में उनके पुत्र टोंक के नवाब वजिरू दौला खां के समय पूरा हुआ।
जैसलमेर की हवेलियाँ
पटवों की हवेली
पटवों की हवेली अपनी शिल्पकला, विशालता एवं अद्भुत नक्काशी के कारण प्रसिद्ध है। पटवों की हवेली को सेठ गुमानचंद बापना ने 18 वीं शताब्दी के उतरार्द्ध में बनवाया। इस हवेली में हिन्दू, ईरानी, यहूदी एवं मुगल स्थापत्य कला का सुन्दर समन्वय है। यह पांच मंजिला हवेली नगर के बीचों-बीच स्थित है।
सालिमसिंह की हवेली
जैसलमेर राज्य के दीवान सालिमसिंह में 1815 में इस नौखण्डी हवेली का निर्माण करवाया। इस हवेली के सात खंड पत्थर के और उपरी दो खण्ड लकड़ी के बने हुए है जिन्हें क्रमशः रंगमहल व शीशमहल कहा जाता था। बाद में लकड़ी के दोनों खण्ड उतार दिये गये। परन्तु पांच मंजिली हवेली जैसलमेर की सबसे ऊँची इमारतों में से एक है। वर्तमान में ऊपरी मंजिलों को जहाज महल व मोती महल कहा जाता है।
नथमल की हवेली
यह 1881 ई. से 1885 के मध्य निर्मित हुई। इस हवेली के द्वार पर पीले पत्थर से निर्मित दो खूबसूरत हाथी हवेली के दो द्वारपालों का आभास कराते हैं। इस हवेली की शिल्पकारी का कार्य हाथी व लालू नामक दो भाईयों ने शुरू किया। यह पांच मंजिली हवेली है जिसका निर्माण महारावल बैरीसाल ने किया।
उदयपुर की हवेलियां
- मोहनसिंह जी की हवेली
- बाफना की हवेली
- पीपलियाँ की हवेली
- बागोर की हवेली।
चितौडगढ़ की हवेलियाँ
इस जिले की सभी हवेलियां चितौडगढ़ दुर्ग में ही है। भामाशाह की हवेली, सलुम्बर ठिकाने की हवेली, रामपुरा ठिकाने की हवेली, जयमल व पता की हवेलियाँ ।
भीलवाड़ा की हवेलियां – केसरीसिंह बारहठ की हवेली ।